05 05

Hindi essay paropkar in hindi

hindi essay paropkar in hindi

नमस्कार मित्र ,

परोपकार दो शब्दों के मेल से बना है , पर ( दूसरों ) + उपकार , दूसरों पर उपकार अर्थात् भलाई। हम कह सकते हैं , इसका अर्थ है दूसरों की भलाई। परमात्मा ने हमें ऐसी शक्तियाँ व सामर्थ्य दिए हैं , जिससे हम दूसरों का कल्याण कर सकते हैं। हम यदि अकेले प्रयत्न करें , तो हमारे लिए अकेले विकास व उन्नति करना संभव नहीं होगा। इसलिए हम केवल अपनी ही भलाई की चिंता करें व दूसरों से कोई सरोकार नहीं रखे , तो इसमें हमारे स्वार्थी होने का प्रमाण मिलता है।

कोई भी मानव अकेले स्वयं की भलाई नहीं कर सकता। उसके अकेले के प्रयत्न उसके काम नहीं आने वाले , उसको इसके लिए दूसरे का साथ अवश्य चाहिए। यदि हम अकेले ही सब कर पाते , तो आज कोई भी मनुष्य इस संसार में दु : खी नहीं रहता। हम सब धनवान , वर्चस्वशाली होने की कामना करते हैं , परंतु यह सब अकेले संभव नहीं है। बिना दूसरों की सहायता व सहयोग के कोई व्यक्ति अपने को औसत स्तर से ऊपर नहीं उठा सकता। अगर हम स्वयं के लिए ही सोचकर कोई आविष्कार करें , तो वह अविष्कार व्यर्थ है। अगर कोई भी आविष्कारकर्ता अपने बारे में ही सोचता , तो आज हम इतनी तरक्की नहीं कर पाते। यही भावना हम प्रकृति के कण - कण में देख सकते हैं - सूर्य , चन्द्र , वायु , पेड़ - पौधे , नदी , बादल और हवा बिना स्वार्थ के संसार की सेवा में लगे हुए हैं।

सूर्य बिना किसी स्वार्थ के अपनी रोशनी से इस जगत को जीवन देता है , चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सबको शीतलता प्रदान करता है , वायु अपनी प्राणवायु से संसार के प्रत्येक छोटे - बड़े जीव को जीवन देती है , पेड़ - पौधे अपने फलों से सबको जीवन देते हैं और नदियाँ व बादल अपने जल के माध्यम से इस जगत में सबको पानी का अमृत देते हैं। ये सब बिना किसी स्वार्थ के युग - युगों से निरन्तर सब की सेवा करते आ रहे हैं। इसके बदले ये हमसें कुछ अपेक्षा नहीं करते , ये बस परोपकार करते हैं।

रहीम जी का ये दोहा इस बात को और भी सत्यता देता है

" वृच्छ कबहु न फल भखै , नदी न संचै नीर।

परमारथ के कराने , साधुन धरा सरीर।। "

भारतीय संस्कृति ने सदैव मानव कल्याण पर जोर दिया है। परोपकार से आत्मा को जो संतोष प्राप्त होता है , वह कितना भी धन खर्च करने पर खरीदा नहीं जा सकता। यदि हम परोपकार की प्रवृत्ति को अपनाए , तो विश्व में व्याप्त समस्त मानव जाति की सेवा कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप हमें जो सुख प्राप्त होगा , वह हमारी संपत्ति से कहीं अधिक मूल्यवान होगा। परोपकार करने का मुख्य कारण है , दूसरों की आत्मा के दुखों को दूर करके स्वयं की आत्मा को सुखी बनाना। रहीम जी कहते हैं

" वो रहीम सुख होत है उपकारी के संग।

बाँटने वारे को लगे ज्यों मेहंदी को रंग।। "

इसलिए हमारे विद्वानों ने सदा परामर्श दिया है कि स्वयं के लिए जीना छोड़कर ईश्वर द्वारा दिए गए साधनों और अपनी क्षमताओं का एक अंश सदा परोपकार में लगाना चाहिए। मात्र दान - पुण्य , पूजा - पाठ , भण्डारे आदि से परोपकार नहीं किया जाता। ये सब दिखावा व भ्रम मात्र है। जो परस्पर सेवा , सहायता और करुणा का सहारा लेते हुए सबका भला करते हैं , वही लोग समाज को प्राणवान और जीवंत बनाए रखने का काम करते हैं। महात्मा गाँधी , मदर टेरेसा , जैसी हस्तियों के उदाहरण आज समाज में कम ही देखने को मिलते हैं पर फिर भी इनके द्वारा ही समाज में आज परोपकार की भावना जीवंत है। हमें परोपकार को जीवन का उद्देश्य बनाकर इसे करते रहना चाहिए।

75% users found this answer helpful.

परोपकार पर निबंध – Paropkar Essay in Hindi

Hindi Mahatva Paropkar Essay Ka Free Essays through on

hindi essay paropkar in hindi

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>